संदर्भ:-

वर्तमान में कोरोना वायरस की वजह से आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ रहे विश्व के सभी देशो की गति पर COVID-19 ने विराम लगा दिया है यह कहना भी गलत नही है की कोरोना वायरस का तेजी से बढना भी इसी दौड़ का परिणाम है, भारत सहित विश्व के सभी देशो में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए सम्पूर्ण लॉक डाउन की व्यवस्था अपनाई गयी है इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए गाँधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित स्वदेशी, स्व्च्छता की अवधारणा का एक महत्वपूर्ण स्थान है !

पश्चिमी सभ्यता के वर्चस्व वाले उस युग में महात्मा गाँधी जी ने भारतीय सभ्यता को श्रेष्ठ बताते हुए उसे संपूर्ण विश्व के लिए एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया था !

गाँधीवादी दृष्टिकोण:-

गाँधीवादी दृष्टिकोण से अभिप्राय महात्मा गाँधी द्वारा अपनाई और विकसित की गयी उन धार्मिक सामाजिक विचारो का समूह जो उन्होंने सबसे पहले वर्ष 1893 से लेकर वर्ष 1914 तक दक्षिण अफ्रीका में तथा उसके बाद फिर अपने देश भारत में अपनाये गये थे!

गाँधीवादी दर्शन न केवल राजनितिक, नैतिक और धार्मिक है बल्कि यह पारम्परिक, आधुनिक तथा साधारण और कठिन भी है, क्यूंकि यह कई पश्चिमी प्रभावों का चिन्ह या प्रतीक है जिनको महात्मा गाँधी जी उजागर किया था, लेकिन यह प्राचीन संस्कृति में निहित है तथा सर्वभोमिक नैतिक और धार्मिक नियमो का पालन करता है!
अगर बात करे गाँधीवादी दृष्टीकोण की तो यह आदर्शवाद पर नही बल्कि व्यावहारिक आदर्शवाद पर अधिक बल देती है !

महात्मा गाँधी जी का दृष्टिकोण विभिन्न प्रेरणादायक स्त्रोतों और नायको से प्रभावित था जैसे भागवतगीता, जैन धर्म , बोद्ध धर्म गोपाल कृष्ण गोखले आदि !

महात्मा गाँधी जी पहले ऐसे भारतीय थे जिन्होंने वर्ष 1909 में अपनी लिखी पुस्तक हिन्द स्वराज में मशीनीकरण के भयानक रूप को रखांकित करते हुए स्वदेशी की महत्ता को बताया था!

महात्मा गाँधी जी के लिए साफ़ सफाई एक बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दा था साल 1895 में जब अंग्रेज सरकार ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय और अन्य एशियाई व्यापरियों से उनके स्थानों को गंदा रखने के आधार पर भेद भाव किया था, तब से लेकर जीवन भर महात्मा गाँधी जी लगातार स्वच्छता पर अपना अधिक जोर देते रहे !

स्वदेशी का अर्थ:-

अगर बात करे स्वदेशी शब्द की तो यह शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है और यह दो शब्दों का एक संयोजन है "स्व" का अर्थ है स्वंय और "देश" का अर्थ है अपना राष्ट्र या देश अर्थात स्वदेशी का अर्थ है अपने देश से परन्तु व्यवाहरिक द्रष्टि में इसका अर्थ आत्मनिर्भर के रूप में लिया जा सकता है !

महात्मा गाँधी जी का यह मानना था की इससे स्वतंत्रता को बढ़ावा मिलेगा, क्यूंकि उस समय भारत पर ब्रिटिश सरकार का नियन्त्रण था और उनके स्वदेशी उद्योगों के नियन्त्रण में निहित था स्वदेशी भारत की स्वतंत्रता की सबसे पहली कुंजी थी !

स्वदेशी अवलोकन:-

स्वदेशी की मशाल सबसे पहले आधुनिक हिंदी के जनक माने जाने वाले भारतेंदु हरिचन्द्र ने अपने लेखन से जलाई थी, साल 1905 का बंग बंग विरोधी आन्दोलन भी स्वदेशी की भावना से ओत-प्रोत था जब बंगाल में विदेशी वस्तुओ की होली जलाई गयी और उनके पूर्ण रूप से बहिष्कार पर बल दिया गया था !

इस स्वदेशी भाव को राष्ट्रिय स्तर पर बड़ा स्वरूप प्रदान करने का कार्य वर्ष 1920 में महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ करके किया था !

महात्मा गाँधी जी ने न केवल विदेशी वस्तुओ के बहिष्कार तथा उनके जलाने तक सिमित रखा बल्कि उद्योग शिल्प भाषा शिक्षा वेश भूषा आदि में भी स्वदेशी के रंग में रंगा दिया था, पर यह अधिक समय तक न चल सकता क्यूंकि भारत को आजादी मिलने के बाद महात्मा गाँधी जी की मृत्यु के बाद उनके द्वारा चलायी जा रही स्वदेशी अवधारणा भी समाप्त होती चली गयी और आधुनिक भारत के मन्दिरों के नाम पर स्वदेशी जमीन पर मशीनों को लाकर बड़े बड़े उद्योग स्थापित किये जाने लगे !

इसका सबसे बड़ा नुकसान हस्त उद्योग और कुटीर उद्योग को हुआ क्यूंकि हस्त उद्योग और कुटीर उद्योग लगभग लुप्त होने लगी भारत ने अपने विनिर्माण क्षेत्र को खो दिया है !

महात्मा गाँधी और स्वच्छता:-

महात्मा गाँधी जी ने गाँव की स्वच्छता के बारे में सार्वजनिक रूप से अपना पहला भाषण 14 फरवरी 1916 में मिशनरी सम्मेलन के दौरान दिया था, उस सम्मेलन में गाँधी जी ने कहा था की गाँव की स्वच्छता के सवाल को बहुत पहले हल किया जाना चाहिए था

उन दिनों महात्मा गाँधी जी ने उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमो में स्वच्छता को तत्काल प्रभाव से शामिल करने की आवश्यकता पर अधिक जोर दिया था

महात्मा गाँधी जी ने भारतीय रेलवे के तीसरी श्रेणी के डिब्बे में बैठकर देश भर के विभिन्न राज्यों की यात्रा करते थे और भारतीय रेलवे के तीसरे श्रेणी के डिबे में गंदगी से बहुत ज्यादा डर गये थे उन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों को लिखे अपने पत्र से इस ओर ध्यान आकर्षित करने को कहा था !