संदर्भ:-

जैसा की आप सभी जानते है की भारत में प्रत्येक वर्ष २४ अप्रैल को पंचायती राज दिवस मनाया जाता है, और इस वर्ष का पंचायती राज दिवस बहुत ही विशेष रहा क्यूंकि इस बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने विभिन्न राज्यों के ग्राम प्रधानो के साथ पंचायती राज के महत्व व कोरोना वायरस के रोकथाम में देश की सभी पंचायतो की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गयी !पंचायती राज दिवस को मनाने का कारण ७३ वां संविधान संशोधन अधिनियम, १९९२ है जो २४ अप्रैल १९९३ से प्रभाव में आया था, आपको ज्ञात है की भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और कोई भी देश राज्य सही मायने में लोकतांत्रिक तभी मानी जा सकती ही जब शक्तियो का विकेंद्रीकरण हो अर्थात ऊपर से निचे नही बल्कि निचे से उपर की ओर हो!

पंचायती राज व्यवस्था में विकास का प्रवाह निचे से ऊपर की ओर करने के लिए साल २००४ में पंचायती राज को एक अलग मंत्रालय का दर्जा दिया गया था!
इस लेख में हम पंचायती राज व्यवस्था की तीन स्तरीय सरंचना और इसकी पृष्ठभूमि विभिन्न समितियां और लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के साथ साथ पंचायतो के बारे में गाँधी दर्शन की उपयोगिता समझने का प्रयत्न किया गया है !

क्या है लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण?

साधारण शब्दों में लोकतान्त्रिक विकेंद्रीकरण से अभिप्राय है की शासन सत्ता को एक स्थान पर केन्द्रित करने के स्थान पर उसे स्थानीय स्तरों पर विभिक्त किया जाए, ताकि आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सके और इससे वो अपने हितो तथा आवश्यकताओ के अनुसार शासन संचालन में अपना योगदान दे सके!
हमें आजादी मिलने के बाद पंचायती राज की स्थापना लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की अवधारणा को पूर्ण करने के लिए उठाये गये महत्वपूर्ण कदमो में से एक थी, साल १९९३ में संविधान के ७३ वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता मिली थी, इसका मुख्य उद्देश्य भारत की लगभग ढाई लाख पंचायतो को अधिक अधिकार देने और उन्हें अधिक मजबूत बनाना था !

पृष्ठभूमि:-

अगर बात करे भारत इ स्थानीय स्वशासन के जनक की तो लार्ड रिपन को इसका जनक माना जाता है, उन्होंने साल १८८२ में उन्होंने स्थानीय स्वशासन संबधी प्रस्ताव दिया जिसे स्थानीय स्वशासन संस्थाओ का "मैग्नाकार्टा" कहा जाता है, साल १९१९ के भारत शासन अधिनियम के तहत प्रान्तों में दोहरे शासन की व्यवस्था की गयी और स्थानीय स्वशासन को हस्तांतरित विषयों की सूची में रखा गया है !

आजादी के बाद साल १९५७ में योजना आयोग द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम के अध्ययन के लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया है !

अगर बात करे पहले त्रि-स्तरीय पंचायत की तो इसका उद्घाटन साल १९५८ में राष्ट्रिय विकास परिषद के बलवंत रे मेहता समिति की सिफारिशे स्वीकार की और २ अक्तूबर १९५९ को राजस्थान के नागौर जिले में उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने किया था !

त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा वर्ष १९९३ में ७३वें और ७४ वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्राप्त हुआ 

७३वें संविधान संशोधन अधिनियम की मुख्य विशेषताएं:-


  • इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा हमारे संविधान में भाग ९ जोड़ा गया था !
  • हमारे मूल संविधान में भाग-९ के अंतर्गत पंचायती राज से संबंधित उपबंधो की चर्चा अनुच्छेद २४३ में की गयी है भाग-९ में "पंचायते" नाम शीर्षक के तहत अनुच्छेद २४३-२४३ण तक पंचायती उपबन्ध है !
  • ग्राम सभा गाँव के स्तर पर उन सभी शक्तियों का उपयोग कर सकती है और वे कार्य कर सकती है जैसा राज्य विधानमंडल निरधारित करे!
  • ७३ वें संविधान द्वारा संविधान में ११वीं अनुसूची जोड़ी गयी और इसके तहत पंचायतो के अंतर्गत २९ विषयों की सूची की व्यवस्था की गयी है !
  • पंचायत की सभी सीटो को पंचायत के निर्वाचन क्षेत्रो से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा निर्वाचित व्यक्तियों से भरा जाएगा इसके लिए प्रत्येक पंचायत क्षेत्र को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रो में इस प्रकार विभक्त किया जाएगा कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की आवादी और आवंटित क्षेत्र की संख्या के बीच का अनुपात साध्य हो और सभी पंचायत के क्षेत्र सामान हो !

पंचायती राज में पंचायतो की अवधि:-

पंचायतो का कार्यकाल ५ साल होता है लेकिन अगर कार्यकाल से पहले इसे भंग करना हो तो इसे भंग किया जा सकता है पंचायत गठित करने लिए नये चुनाव समय सीमा की अवधि की समाप्ति या पंचायत भंग होने की तिथि से ६ माह की अंदर ही करा लिए जाने चाहिए !

पंचायतो के संबंध में गाँधी दर्शन:-

  • राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी अपने आप को ग्रामवासी ही मानते थे और वो गाँव में ही बस गये थे, इसके लिए उन्होंने गाँव की आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए अनेक संस्थाए आरंभ की थी, साथ ही उन्होंने गाँव वालो की शारीरिक, आर्थिक, समाजिक और नैतिक स्तिथि में सुधार लाने के लिए उन्होंने भारी मात्रा में प्रयास भी किये थे !
  • महात्मा गाँधी जी का अटूट मत था की गाँवो की स्तिथि में सुधार करके ही देश को सभी दृष्टि से अजय बनाया जा सकता है, इसलिए संविधान में अनुच्छेद ४० के अंतर्गत गंधी जी की कल्पना के अनुसार ही भारत में ग्राम पंचायतो के संगठन की व्यवस्था की गयी थी!
  • महात्मा गाँधी जी मानना था की ग्राम पंचायतो को प्रभावशील होने में तथा प्राचीन गौरव के अनुकूल होने में कुछ समय अवश्य लगेगा यदि शुरू में ही उनके हाथो में दंडकारी शक्ति सौंप दी गी तो उसका अनुकूल प्रभाव पड़ने के स्थान पर विपरीत प्रभाव पढ़ेगा!
  • गाँधी जी के इस विचार का तात्पर्य पंचायत को अधिकार विहीन बनाना नही बल्कि अधिकारों का दंड देने के रूप में संयमित प्रयोग किये जाने से था !